उलझी पहेली ये ज़िन्दगी -
सुलझाने की फुर्सत है किसे ,
बेवफा की नाकाम-ऐ-मोहब्बत -
आज़माने की फुर्सत है किसे ,
मह के संग में ,मस्त-ऐ-जन्नत के आलम में हूँ यार मेरे ,
महखाने के दर -बाहर दर्द हो या दोजख ,
फिलहाल इस ख़याल की फुर्सत है किसे .
