Monday, November 29, 2004

Ashiqee

इश्क-आशिकी बातें हैं निकुमों-नाकारों की,
चलो हम तुम्हारा ये इल्जाम भी सह लें गे ,
तोहमतें तुम लगाओ चाहे हज़ार -
दामन-इ-यार न हम फिर भी छोड़े गे.

Thursday, November 25, 2004

ZINDAGI

उलझी पहेली ये ज़िन्दगी -
सुलझाने की फुर्सत है किसे ,
बेवफा की नाकाम-ऐ-मोहब्बत -
आज़माने की फुर्सत है किसे ,
मह के संग में ,मस्त-ऐ-जन्नत के आलम में हूँ यार मेरे ,
महखाने के दर -बाहर दर्द हो या दोजख ,
फिलहाल इस ख़याल की फुर्सत है किसे .